AWGP- GURUDEV LITERATURE- मनुष्य का अस्तित्व आखिर कब तक होता है? जानिए यहाँ-

 जब प्राण छोड़ते हैं शरीर को, तो क्या होती है यह प्रक्रिया-
आखिर प्राण जाने के बाद क्या है प्रकाश लोक, समझिये यहाँ- 
मृत्यु के समय कहाँ इकठ्ठे होते हैं प्राण, जानिए यह पूरी प्रक्रिया- 
आखिर मृत्यु के समय क्यों आती है, बेहोशी, जान लीजिए यहाँ-
जन्म और मृत्यु के बीच के समय में आत्मा कहां रहती है?



भारतीय संस्कृति, शास्त्र,पुराण या गीता के अनुसार हमारी आत्मा कभी भी मरती नहीं है, वह हमेशा रहती है। अर्थात हमारा शरीर रहें या न रहें लेकिन मनुष्य का अशरीरी अस्तित्व हजारों वर्षों तक ही नहीं युगों तक रहता है। क्योंकि संकल्प शक्ति और प्राणशक्ति द्वारा उस शरीर को धारण करने में आत्मा नहीं बल्कि उसकी किरणें मात्र होती हैं। जैसे सूर्य से किरणें निकलती है। 

उसमें से कितनी पृथ्वी पर आती हैं।हर किरण का अपना अलग अस्तित्व है।उसी प्रकार जो प्राणी जगत हमें दिखाई देता है वह एक परमात्मा का ही अंश है। फिर हर आत्मा अनेक जीवात्मा के रूप में जन्म लेती है। जैसे एक रुपए में सौ पैसे बने। फिर एक पैसे का सौवां हिस्सा एक जीवात्मा बनी। फिर भी इसका अस्तित्व और शक्ति असीम है। जैसे पानी की एक बूंद का अपना कोई अस्तित्व नहीं है, परंतु जब नदी के साथ बहकर समूद्र में मिल जाती है और भाप बनकर फिर बादल बन जाती है तो उसका महत्व बढ़ जाता है। 

इसी प्रकार हमारी आत्मा का transformation होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार जो व्यक्ति मृत्यु के मुंह से वापिस आ गए, उनके अनुसार चेतना अपना भौतिक शरीर छोड़ने के बाद स्वयं को स्वतंत्र सत्ता के रूप में महसूस करती है। फिर वह अंधेरी सुरंग से होते हुए किसी प्रकाश लोक में जाती है। वहां वह सुख, शांति और संतोष को महसूस करती है। लेकिन फिर किसी अज्ञात प्रेरणा के कारण उसे फिर से शरीर धारण करना पड़ता है।


मृत्यु के समय जब प्राण शरीर को छोड़ते हैं, तो यह प्रक्रिया किस प्रकार होती है?

वैज्ञानिकों की खोज के अनुसार जो प्राण पूरे शरीर में फैला हुआ है। जैसे किसी वस्तु को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने के लिए पहले उसे एक जगह पर इकट्ठा किया जाता है। फिर एक जगह से दूसरी जगह पर भेजा जाता है। यहां पर प्राण एक शरीर को छोड़कर कहीं और जा रहा है तो मृत्यु के समय सब नाडियों में से प्राण खींचकर एक जगह इकट्ठा होता है। लेकिन पुराने अभ्यास के कारण वह वापस नाडियों में जाता है।उस प्राण के आने जाने से जो आघात लगता है उससे मनुष्य को दर्द महसूस होता है।जैसे डॉक्टर कोई भी आपरेशन करने से पहले उस व्यक्ति को या उस अंग को बेहोश कर देता है।उसी प्रकार परमात्मा बहुत दयालु है।

 जब प्राण निकलने का समय पास आता है तो शरीर को बेहोश कर देता है। वह किसी भी आत्मा को दुःख नहीं देता है। लेकिन जीवन का दुरुपयोग करने से आत्मा को मानसिक दुःख होता है। इसलिए पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं, कि अब तक भूले पर, अब मत भूलो। आंखें खोलो। सचेत हो जाओ। जीवन क्या है, हम क्या है, हमारा उद्देश्य क्या है, इसे ध्यान में रखो और हर पल यह सोचो, कि मैं अविनाशी, निर्विकार, सच्चिदानंद आत्मा हूं। संसार एक नाटक है‌ यह मेरी संपत्ति नहीं, बल्कि मेरा कर्तव्य है। 

सिर्फ दो प्रकार के व्यक्ति ही बता सकते हैं, कि जन्म और मृत्यु के बीच की परिस्थितियां कैसी होती हैं।जिसने पहले मृत्यु को प्राप्त कर लिया, लेकिन फिर अपने उसी शरीर में जिंदा हो गया या वह प्रेत योनि में अपना परिचय देता है।  Positive soul सहायता, सहयोग के रुप में और negative soul असहयोग के रूप में अपना परिचय देती है। वैज्ञानिकों की खोजबीन में फिर से जिंदा हुए व्यक्ति के अनुसार मृत्यु एक सुखद अनुभव है। परन्तु मृत्यु का अज्ञान ही दुःख का कारण है। इसलिए न तो स्वयं परेशान हों और ना ही दूसरों को परेशान करें।

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